जब भक्त की पुकार सुन के स्वयं धरती पर आयी मां कुष्मांडा.. जानिए क्या है दुर्गाकुंड की पौराणिक मान्यता
इस मंदिर का जीर्णोद्धार 1760 में बंगाल की रानी भवानी ने कराया था। इस मंदिर में मां दुर्गा यंत्र के रूप में विराजमान है। इनके साथ ही इस मंदिर में बाबा भैरव, मां काली, मां लक्ष्मी, मां सरस्वती विराजमान है। मान्यताओं के अनुसार माता के दर्शन के पश्चात यहां कुक्कटेश्वर महादेव का दर्शन करना अनिवार्य है तभी मां की पूजा पूरी होती है। ऐसी भी मान्यता है कि असुरों का वध करने के बाद मां कुष्मांडा यही विश्राम करने आयी थी तथा माता यहां आदि शक्ति के रूप में विराजमान हैं।
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार जहां माता स्वयं प्रकट होती हैं वहां मूर्ति स्थापित नहीं की जाती है। ऐसे मंदिरों में केवल मुखोटे और चरण पादुका की पूजा की जाती है। दुर्गा मंदिर भी उन्हीं मंदिरों में से एक है। यहां मां के भव्य मुखोटे तथा चरण पादुका की पूजा होती है। दुर्गा मंदिर बीसा यंत्र पर आधारित है।
इस कुंड से जुड़ी एक अद्भुत कहानी है। बताया जाता है कि काशी नरेश राजा सुबाहु ने अपनी पुत्री के विवाह के लिए स्वयंवर की घोषणा किए थे। स्वयंवर से पहले राजा की पुत्री को सपने में राजकुमार सुदर्शन के संग विवाह होते देखा राजकुमारी स्वप्न की सारी बात अपने पिता राजा सुबाहु को बतायी। काशी नरेश ने जब यह बातें स्वयंवर में आए राजा महाराजा को बताया तो सभी राजा महाराजा सुदर्शन के खिलाफ हो गये और युद्ध की घोषणा कर दी। राजकुमार ने युद्ध से पहले मां दुर्गा की आराधना की और विजयी होने का आशीर्वाद मांगा। कहा जाता है कि युद्ध के दौरान मां दुर्गा ने राजकुमार के सभी विरोधियों का वध कर डाला। युद्ध में इतना रक्तपात हुआ कि वहां रक्त का कुंड बन गया जो आज भी दुर्गाकुंड के नाम से विख्यात है। इसके बाद राजकुमार सुदर्शन का विवाह राजकुमारी के साथ हुआ। एक और लोकोक्ति के अनुसार ऐसा कहा जाता है कि प्राचीन काल में यहां बलि भी दिया जाता था और उसका जितना भी रक्त निकलता था वह कुंड में जाता था। जिससे इसे रक्त कुंड के नाम से जाना जाता था।
– शालिनी त्रिपाठी
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