Guru Purnima: महर्षि वेदव्यास ने की थी गुरु पूर्णिमा की शुरुआत, जानें कैसे मनाएं यह पवित्र पर्व
महर्षि वेदव्यास ने की थी गुरु परंपरा की शुरुआत
आषाढ़ पूर्णिमा को गुरु पूर्णिमा पर्व के रूप में मनाने की शुरुआत महर्षि वेदव्यास जी के पांच शिष्यों द्वारा की गई थी। आषाढ़ माह के दिन ही महर्षि वेद व्यास ने अपने शिष्यों और ऋषि-मुनियों को श्रीभागवत पुराण का ज्ञान दिया था। इसी तिथि पर महर्षि वेदव्यास का जन्म भी हुआ था। तब से महर्षि वेद व्यास के पांच शिष्यों ने इस दिन को गुरु पूर्णिमा के रूप में मनाने और इस दिन गुरु पूजन करने की परंपरा की शुरुआत हुई। इसके बाद से हर साल आषाढ़ माह की पूर्णिमा के दिन को गुरु पूर्णिमा या व्यास पूर्णिमा के रूप में मनाया जाने लगा। इस वर्ष सोमवार, 3 जुलाई को आषाढ़ मास की पूर्णिमा है।
महाभारत, 18 महापुराण और ब्रह्मसूत्र के रचयिता थे वेदव्यास
हिंदू धर्म में महर्षि वेदव्यास को ब्रह्मा, विष्णु और महेश का रूप माना गया है। महर्षि वेदव्यास को बाल्यकाल से ही अध्यात्म में गहरी रूचि थी। ईश्वर के ध्यान में लीन होने के लिए वह वन में जाकर तपस्या करना चाहते थे, लेकिन उनके माता-पिता ने उन्हें आज्ञा नहीं दी। जब वह जिद्द पर अड़े तो उनकी माता ने उन्हें वन में जाने की अनुमति दे दी, लेकिन माता ने कहा कि वन में परिवार की याद आए तो तुरंत वापस लौट आना। इसके बाद पिता भी राजी हो गये। इस तरह माता-पिता की अनुमति के बाद महर्षि वेदव्यास ईश्वर के ध्यान के लिए वन में चले गये और तपस्या शुरू कर दी। अपने ध्यान और ज्ञान के बल पर वेदव्यास ने संस्कृत भाषा में प्रवीणता हासिल की और इसके बाद उन्होंने महाभारत, 18 महापुराण, ब्रह्मसूत्र समेत कई धर्म ग्रंथों की रचना की। साथ ही वेदों का विस्तार भी किया।
गुरु पूर्णिमा का महत्व
शास्त्रों में गुरु को देवताओं से भी ऊंचा स्थान दिया गया है। स्वयं भगवान शिव गुरु के बारे में कहते हैं, ‘गुरुर्देवो गुरुर्धर्मो, गुरौ निष्ठा परं तपः। गुरोः परतरं नास्ति, त्रिवारं कथयामि ते।।’ यानी गुरु ही देव हैं, गुरु ही धर्म हैं, गुरु में निष्ठा ही परम धर्म है। इसका अर्थ है कि गुरु की आवश्यकता मनुष्यों के साथ ही स्वयं देवताओं को भी होती है। गुरु को लेकर कहा गया है कि, ‘हरि रूठे गुरु ठौर है, गुरु रूठे नहीं ठौर’. यानी भगवान के रूठने पर गुरु की शरण मिल जाती है लेकिन गुरु अगर रूठ जाए तो कहीं भी शरण नहीं मिलती। इसलिए जीवन में गुरु का विशेष महत्व है। मान्यता है कि गुरु पूर्णिमा के दिन अपने गुरु की पूजा करने या आशीर्वाद लेने से जीवन की बाधाएं दूर हो जाती है। बौद्ध धर्म मानने वाले भी गौतम बुद्ध के सम्मान में गुरु पूर्णिमा मनाते हैं। दरअसल, गौतम बुद्ध ने अपना पहला उपदेश इसी दिन उत्तर प्रदेश के सारनाथ में दिया था। ऐसा माना जाता है कि इस दिन प्रार्थना सीधे महागुरु तक पहुंचती है और उनका आशीर्वाद शिष्य के जीवन से अंधकार और अज्ञान को दूर करता है।
गुरु पूजा के महापर्व पर कौन-कौन से शुभ कार्य करें
आषाढ़ पूर्णिमा की सुबह जल्दी उठ जाना चाहिए। स्नान के बाद भगवान शिव और सूर्य पूजा के साथ दिन की शुरुआत करें। सूर्योदय के समय सूर्य को अर्घ्य अर्पित करना चाहिए। तांबे के लोटे में जल भरें, चावल और लाल फूल डालें। इसके बाद ऊँ सूर्याय नम: मंत्र जप करते हुए अर्घ्य अर्पित करें। अपने माता-पिता का आशीर्वाद लें, क्योंकि माता-पिता ही हमारे पहले गुरु होते हैं। इसके बाद अपने गुरु का आशीर्वाद लें और अपने सामर्थ्य से गुरु को गुरु दक्षिणा अर्पण करें। गुरु व्यास के साथ-साथ शुक्रदेव और शंकराचार्य आदि गुरुओं का भी आव्हान करें और ”गुरुपरंपरासिद्धयर्थं व्यासपूजां करिष्ये” मंत्र का जाप करें।
गुरु पूर्णिमा पर दान-पुण्य की महत्ता
गुरु पूर्णिमा वर्षा ऋतु में आती है, ऐसे में बारिश के दिनों में जरूरतमंद लोगों को धन और अनाज के साथ ही कपड़े और छाते का दान जरूर करें। गुरु पूर्णिमा पर दान-पुण्य करते हैं तो इसका अक्षय पुण्य मिलता है। अक्षय पुण्य यानी ऐसा पुण्य, जिसका असर जीवन भर बना रहता है। किसी मंदिर में पूजन सामग्री भी भेंट कर सकते हैं।
तीर्थ दर्शन और पवित्र नदी में स्नान करने की है परंपरा
गुरु पूर्णिमा पर पौराणिक मंदिर में दर्शन पूजन करना चाहिए। इसके साथ ही किसी पवित्र नदी में स्नान भी कर सकते हैं। आषाढ़ पूर्णिमा पर तीर्थ दर्शन करने की परंपरा है। अगर नदी स्नान नहीं कर पा रहे हैं तो घर पर ही पानी में गंगाजल मिलाकर स्नान कर सकते हैं।
गुरु पूर्णिमा पर पूजन का शुभ योग
गुरु पूर्णिमा के दिन इस बार कई शुभ योग बन रहे हैं। इस दिन ब्रह्म योग और इंद्र योग बनेंगे। वहीं, सूर्य और बुध की युति से बुधादित्य योग का निर्माण भी होने जा रहा है। ब्रह्म योग 2 जुलाई को शाम 7 बजकर 26 मिनट से 3 जुलाई दोपहर 3 बजकर 45 मिनट तक तथा इंद्र योग की शुरुआत 3 जुलाई को दोपहर 3 बजकर 45 मिनट पर शुरु होगा और इसका समापन 4 जुलाई को सुबह 11 बजकर 50 मिनट पर होगा।
गुरु सांदीपनि ने श्री कृष्ण को दी पूरी 64 कलाओं की शिक्षा
गुरु की आवश्यकता सिर्फ मनुष्यों को ही नहीं बल्कि स्वयं भगवान को भी होती है। यह बात भगवान श्रीकृष्ण पर भी लागू होती है। गुरु सांदीपनि भगवान कृष्ण और बलराम दोनों के गुरु थे। उनके गुरुकुल में कई राजाओं के पुत्र पढ़ते थे, लेकिन गुरु सांदीपनि ने कृष्णजी को पूरी 64 कलाओं की शिक्षा दी थी। भगवान विष्णु के अवतार होने के बाद भी श्रीकृष्ण ने गुरु सांदीपनि से शिक्षा ग्रहण की। गुरु-शिष्य के इस अनोखे रिश्ते से यह साबित होता है कि कोई भी चाहे कितना ही ज्ञानी हो या बड़ा हो, फिर भी उसे एक गुरु की आवश्यकता तो होती ही है। यह भी कहा जाता है कि श्री कृष्णा ने भी अपने गुरु को गुरु दक्षिणा अर्पित की थी।
जब कृष्णजी की शिक्षा पूरी हो गई तो गुरु सांदीपनि ने उनसे गुरु दीक्षा के रूप में यमलोक से अपने पुत्र को वापस लाने को कहा और श्रीकृष्ण ने भी उनके पुत्र को वापस धरती पर लाकर अपनी गुरु दीक्षा दी।
पूजन करने से मजबूत होता हैं बृहस्पति
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार बृहस्पति ग्रह की कृपा पाने और अशुभ प्रभावों को कम करने के लिए गुरु पूर्णिमा का दिन शुभ माना जाता है। ज्योतिष में बृहस्पति को विद्या, नैतिकता, आत्मविश्वास, आशा, सम्मान और कानून का ग्रह माना जाता है। अगर किसी की कुंडली में गुरु दोष है, तो सुख- समृद्धि की कमी, आत्मविश्वास की हानि, खर्च, झगड़े, स्वार्थ, शैक्षिक बाधाएं और व्यक्ति में और उसके आस-पास सद्भाव की कमी जैसी समस्याएं होती हैं। इस दिन गुरु पूजा के साथ भगवान विष्णु की पूजा करके गुरु को मजबूत कर सकते हैं।
“गुरु ब्रह्मा गुरु विष्णु गुरु देवो महेश्वरा गुरु साक्षात परम ब्रह्मा तस्मै श्री गुरुवे नमः”।।
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